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Saturday, September 12, 2009

Niyati - Arif Khan

नियति


रात की दस्तक दरवाज़े पर है
आज का दिन भी बीत गया है
कितना था उजाला फिर भी फिर से
अन्धियारा ही जीत गया है
एकान्त की चादर ओढ़ कर फिर से
मैं खुद में खोया जाता हूँ
आँखों के सामने यादों के रथ पर
मेरा ही अतीत गया है
सन्नाटों के गुन्जन में दबकर
अपनी ही आवाज़ नहीं आती मुझको
आँखों की सरहद पर लड़ता
आँसू भी अब जीत गया है
टूटे दर्पण के सामने बैठकर
मैं स्वयं को खोज रहा हूँ
यूँ ही बैठे बैठे जाने
कितना अरसा बीत गया है ... ॥

- आरिफ़ ख़ान


Bhram - Arif Khan

भ्रम


दिन भर एक कोलाहल के साध
उस हँसी के ठहाकों के बीच
जिन्दा रहने की वो जुजुत्सा
सामान्य दिखने का वो सफल प्रयास
दम तोड़ देता है
रात की आहट पर
जब घेरता है
वही कुहाँसा घनघोर अन्धेरा
और गिर पड़ती है
पानी की दो बूँदें
मेरे ही गालों पर
हमेशा की तरह ...

- आरिफ़ ख़ान


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