Showing posts with label Deepti Gupta. Show all posts
Showing posts with label Deepti Gupta. Show all posts

Monday, August 10, 2009

Rishtey- Deepti Gupta

रिश्ते

अक्सर रिश्तों को रोते हुए देखा है, 
अपनों की ही बाँहो में मरते हुए देखा है
टूटते, बिखरते, सिसकते, कसकते 
रिश्तों का इतिहास, 
दिल पे लिखा है बेहिसाब! 
प्यार की आँच में पक कर पक्के होते जो, 
वे कब कौन सी आग में झुलसते चले जाते हैं,
झुलसते चले जाते हैं और राख हो जाते हैं! 
क्या वे नियति से नियत घड़ियाँ लिखा कर लाते हैं?
कौन सी कमी कहाँ रह जाती है 
कि वे अस्तित्वहीन हो जाते हैं, 
या एक अरसे की पूर्ण जिन्दगी जी कर,
वे अपने अन्तिम मुकाम पर पहुँच जाते हैं! 
मैंने देखे हैं कुछ रिश्ते धन-दौलत पे टिके होते हैं,
कुछ चालबाजों से लुटे होते हैं-गहरा धोखा खाए होते हैं 
कुछ आँसुओं से खारे और नम हुए होते हैं,
कुछ रिश्ते अभावों में पले होते हैं- 
पर भावों से भरे होते है! बड़े ही खरे होते हैं ! 
कुछ रिश्ते, रिश्तों की कब्र पर बने होते हैं,
जो कभी पनपते नहीं, बहुत समय तक जीते नहीं 
दुर्भाग्य और दुखों के तूफान से बचते नहीं!
स्वार्थ पर बनें रिश्ते बुलबुले की तरह उठते हैं 
कुछ देर बने रहते हैं और गायब हो जाते हैं; 
कुछ रिश्ते दूरियों में ओझल हो जाते हैं,
जाने वाले के साथ दूर चले जाते हैं ! 
कुछ नजदीकियों की भेंट चढ़ जाते हैं,
कुछ शक से सुन्न हो जाते हैं ! 
कुछ अतिविश्वास की बलि चढ़ जाते हैं! 
फिर भी रिश्ते बनते हैं, बिगड़ते हैं, 
जीते हैं, मरते हैं, लड़खड़ाते हैं, लंगड़ाते हैं
तेरे मेरे उसके द्वारा घसीटे जाते हैं,
कभी रस्मों की बैसाखी पे चलाए जाते हैं!

पर कुछ रिश्ते ऐसे भी हैं 
जो जन्म से लेकर बचपन जवानी - बुढ़ापे से गुजरते हुए,
बड़ी गरिमा से जीते हुए महान महिमाय हो जाते हैं ! 
ऐसे रिश्ते सदियों में नजर आते हैं ! 
जब कभी सच्चा रिश्ता नजर आया है
कृष्ण की बाँसुरी ने गीत गुनगुनाया है! 
आसमां में ईद का चाँद मुस्कराया है! 
या सूरज रात में ही निकल आया है! 
ईद का चाँद रोज नहीं दिखता,
इन्द्रधनुष भी कभी-कभी खिलता है! 
इसलिए शायद - प्यारा खरा रिश्ता 
सदियों में दिखता है, मुश्किल से मिलता है पर, 
दिखता है, मिलता है, यही क्या कम है .. !!!

- दीप्ति गुप्ता


Nishchal Bhaav - Deepti Gupta

निश्छल भाव

मेरे अन्दर एक सूरज है, जिसकी सुनहरी धूप 
देर तक मन्दिर पे ठहर कर 
मस्जिद पे पसर जाती है ! 
शाम ढले, मस्जिद के दरो औ- 
दीवार को छूती हुई मन्दिर की 
चोटी को चूमकर छूमन्तर हो जाती है !

मेरे अन्दर एक चाँद है, जिसकी रूपहली चाँदनी 
में मन्दिर और मस्जिद 
धरती पर एक हो जाते है ! 
बड़े प्यार से गले लग जाते हैं !
उनकी सद्भावपूर्ण परछाईयाँ 
देती हैं प्रेम की दुहाईयाँ ! 

मेरे अन्दर एक बादल है, जो गंगा से जल लेता है 
काशी पे बरसता जमकर 
मन्दिर को नहला देता है, 
काबा पे पहुँचता वो फिर 
मस्जिद को तर करता है ! 
तेरे मेरे दुर्भाव को, कहीं दूर भगा देता है ! 

मेरे अन्दर एक झोंका है, भिड़ता कभी वो आँधी से, 
तूफ़ानों से लड़ता है, 
मन्दिर से लिपट कर वो फिर 
मस्जिद पे अदब से झुक कर 
बेबाक उड़ा करता है ! 
प्रेम सुमन की खुशबू से महका-महका रहता है !

मेरे अन्दर एक धरती है, मन्दिर को गोदी लेकर 
मस्जिद की कौली भरती है, 
कभी प्यार से उसको दुलराती 
कभी उसको थपकी देती है, 
ममता का आँचल ढक कर दोनों को दुआ देती है !

मेरे अन्दर एक आकाश है, बुलन्द और विराट है, 
विस्तृत और विशाल है,
निश्छल और निष्पाप है,
घन्टों की गूँजें मन्दिर से,
उठती अजाने मस्जिद से 
उसमें जाकर मिल जाती है करती उसका विस्तार है !

- दीप्ति गुप्ता


Mrityu: Do Pratichhavi (Saheli ) - Deepti Gupta

मृत्यु: दो प्रतिछवि-२
सहेली

'जीवन' मिला है जब से,
तुम्हारे साथ जी रही हूँ तब से,
तुम मेरी और मैं तुम्हारी
सहेली कई बरस से,
तुम मुझे 'जीवन' की ओर
धकेलती रही हो कब से,
"अभी तुम्हारा समय नहीं आया"
मेरे कान में कहती रही हो हँस के,
जब - जब मैं पूछती तुमसे,
असमय टपक पड़ने वाली
तुम इतनी समय की पाबंद कब से,
तब खोलती भेद कहती मुझसे,
ना, ना, ना, ना असमय नहीं,
आती हूँ समय पे शुरू से,
'जीवन' के खाते में अंकित
चलती हूँ, तिथि - दिवस पे
'नियत घड़ी' पे पहुँच निकट मैं
गोद में भर लेती हूँ झट से!
'जीवन' मिला है जब से,
तुम्हारे साथ जी रही हूँ तब से !

- दीप्ति गुप्ता


Mrityu: Do Pratichhavi - (Mukati ka daur) - Deepti Gupta

मृत्यु: दो प्रतिछवि-१
"मुक्ति का द्वार"

अब मैं समझ गई हे!
मौत, तुम कहीं भी,
कभी भी आ सकती हो,
तुम्हारा आना निश्चित है, अटल है,
जीवन में तुम ऐसे समाई हो,
जैसे आग में तपन, काँटे में चुभन !
सोच-सोच हर पल तुम्हारे बारे में,
मैं निकट हो गई इतनी,
सखी होती घनिष्ठ जितनी,
तुम बनकर जीवन दृष्टि,
लगी करने विचार- सृष्टि
भावों की अविरल वृष्टि !
मैं जीवन में 'तुमको',
तुम में लगी देखने 'जीवन'
इस परिचय से हुआ
अभिनव 'प्रेम मन्थन'
प्रेम ढला "श्रद्धा" में
"श्रद्धा" से देखा भरकर रूप तुम्हारा -
"सिद्धा" ! तुम्हारे लिए मेरा ये "प्यार"
बना जीवन "मुक्ति का द्वार" ! 

- दीप्ति गुप्ता


My Blog List