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Monday, August 10, 2009

Sakhee In Nainan Te Ghan Haare - Surdas

सखी, इन नैनन तें घन हारे ।
बिन ही रितु बरसत निसि बासर, सदा मलिन दोउ तारे ॥
ऊरध स्वाँस समीर तेज अति, सुख अनेक द्रुम डारे ।
दिसिन्ह सदन करि बसे बचन-खग, दुख पावस के मारे ॥
सुमिरि-सुमिरि गरजत जल छाँड़त, अंसु सलिल के धारे ॥
बूड़त ब्रजहिं 'सूर' को राखै, बिनु गिरिवरधर प्यारे ॥

- सूरदास


Preeti Kari Kaahu Sukh Na Lahyo - Surdas

प्रीति करि काहु सुख न लह्यो।
प्रीति पतंग करी दीपक सों, आपै प्रान दह्यो॥
अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों, संपति हाथ गह्यो।
सारँग प्रीति करी जो नाद सों, सन्मुख बान सह्यो॥
हम जो प्रीति करि माधव सों, चलत न कछु कह्यो।
'सूरदास' प्रभु बिनु दुख दूनो, नैननि नीर बह्यो॥

- सूरदास


Piyaa Bin Naagin Kaalee Raat - Surdas

पिया बिन नागिन काली रात ।
कबहुँ यामिन होत जुन्हैया, डस उलटी ह्वै जात ॥
यंत्र न फुरत मंत्र नहिं लागत, आयु सिरानी जात ।
'सूर' श्याम बिन बिकल बिरहिनी, मुर-मुर लहरें खात ॥

- सूरदास


Nis Din Barsat Nain Hamaare - Surdas

निसिदिन बरसत नैन हमारे।
सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जबते स्याम सिधारे।।
अंजन थिर न रहत अँखियन में, कर कपोल भये कारे।
कंचुकि-पट सूखत नहिं कबहुँ, उर बिच बहत पनारे॥
आँसू सलिल भये पग थाके, बहे जात सित तारे।
'सूरदास' अब डूबत है ब्रज, काहे न लेत उबारे॥

- सूरदास


Mero Man Anat Kahaan Sukh Paave - Surdas

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे।
जैसे उड़ि जहाज की पंछि, फिरि जहाज पर आवै॥
कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।
परम गंग को छाँड़ि पियसो, दुरमति कूप खनावै॥
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल खावै।
'सूरदास' प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥

- सूरदास


Maiyaa Moree Main Naheen Maakhan Khaayo - Surdas

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो,
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहिं पठायो ।
चार पहर बंसीबट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ॥
मैं बालक बहिंयन को छोटो, छींको किहि बिधि पायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ॥
तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतिआयो ।
जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो ॥
यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो ।
'सूरदास' तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥

- सूरदास


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