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Monday, September 7, 2009

Dhoop -Vinod Nigam

धूप

घाटियों में ऋतु सुखाने लगी है
मेघ धोये वस्त्र अनगिन रंग के
आ गए दिन, धूप के सत्संग के।

पर्वतों पर छन्द फिर बिखरा दिये हैं
लौटकर जातीं घटाओं ने।
पेड़, फिर पढ़ने लगी हैं, धूप के अखबार
फुरसत से दिशाओं में।
निकल, फूलों के नशीली बार से
लड़कड़ाती है हवा
पाँव दो, पड़ते नहीं हैं ढ़ग के।

बँध न पाई, निर्झरों की बाँह, उफनाई नदी
तटों से मुँह जोड़ बतियाने लगी है।
निकल जंगल की भुजाओं से, एक आदिम गंध
आंगन की तरफ आने लगी है।

आँख में आकाश की चुभने लगी हैं
दृश्य शीतल, नेह-देह प्रसंग के।
आ गए दिन, धूप के सत्संग के।

- विनोद निगम


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