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Tuesday, August 11, 2009

Roshnee - Madhup Mohta

रोशनी

रात, हर रात बहुत देर गए,
तेरी खिड़की से, रोशनी छनकर,
मेरे कमरे के दरो-दीवारों पर,
जैसे दस्तक सी दिया करती है।

मैं खोल देता हूँ चुपचाप किवाड़,
रोशनी पे सवार तेरी परछाई,
मेरे कमरे में उतर आती है,
सो जाती है मेरे साथ मेरे बिस्तर पर।

मधुप मोहता

Gaanv - Madhup Mohta

गांव

एक अंधेरा, एक ख़ामोशी, और तनहाई,
रात के तीन पांव होते हैं।
ज़िन्दगी की सुबह के चेहरे पर,
रास्ते धूप छाँव होते हैं।

ज़िन्दगी के घने बियाबाँ में,
प्यार के कुछ पड़ाव होते हैं।
अजनबी शहरों में, अजनबी लोगों के बीच,
दोस्तों के भी गांव होते हैं।

मधुप मोहता


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