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Tuesday, August 11, 2009

Smriti Deep - Lavanya Shah

स्मृति दीप

भग्न उर की कामना के दीप,
         तुम, कर में लिये,
मौन, निमंत्र्ण, विषम, किस साध में हो बाँटती?
         है प्रज्वलित दीप, उद्दीपित करों पे,
                 नैन में असुवन झड़ी!
         है मौन, होठों पर प्रकम्पित,
                 नाचती, ज्वाला खड़ी!
बहा दो अंतिम निशानी, जल के अंधेरे पाट पे,
' स्मृतिदीप ' बन कर बहेगी, यातना, बिछुड़े स्वजन की!
         एक दीप गंगा पे बहेगा,
                 रोयेंगी, आँखें तुम्हारी।
     धुप अँधकाररात्रि का तमस।
         पुकारता प्यार मेरा तुझे, मरण के उस पार से!
बहा दो, बहा दो दीप को
         जल रही कोमल हथेली!
     हा प्रिया! यह रात्रिवेला औ
         सूना नीरवसा नदी तट!
नाचती लौ में धूल मिलेंगी,
         प्रीत की बातें हमारी!

लावण्या शाह


Anunay - Lavanya Shah

अनुनय

मेरे अधर अधर से छू लेने दो!
     अधर अधर से छू लेने दो!
है बात वही, मधुपाश वही,
     सुरभीसुधारस पी लेने दो!
         अधर अधर से छू लेने दो!
कंवल पंखुरी लाल लजीली,
     है थिरक रही, नई कुसुमसी!
रश्मिनूतन को, सह लेने दो!
          मेरे अधर अधर से छू लेने दो!
तुम जीवन की मदमाती लहर,
          है वही डगर,
डगमग पगभर,
     सुखसुमन-सुधा रस पी लेने दो!
मेरे अधर अधर से छू लेने दो!
     अधर अधर से छू लेने दो! 

लावण्या शाह


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