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Monday, September 7, 2009

Phool Nahin Badle Guldaston Ke -Umakant Malviya

फूल नहीं बदले गुलदस्तों के

टूटे आस्तीन का बटन
या कुर्ते की खुले सिवन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        फूल नहीं बदले गुलदस्तों के
        धूल मेजपोश पर जमी हुई।
        जहाँ-तहाँ पड़ी दस किताबों पर
        घनी सौ उदासियाँ थमी हुई।
पोर-पोर टूटता बदन
कुछ कहने-सुनने का मन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        अरसे से बदला रूमाल नहीं
        चाभी क्या जाने रख दी कहाँ।
        दर्पण पर सिंदूरी रेख नहीं
        चीज़ नहीं मिलती रख दो जहाँ।
चौक की धुआँती घुटन
सुग्गे की सुमिरिनी रटन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        किसे पड़ी, मछली-सी तड़प जाए
        गाल शेव करने में छिल गया।
        तुमने जो कलम एक रोपी थी
        उसमें पहला गुलाब खिल गया।
पत्र की प्रतीक्षा के क्षण
शहद की शराब की चुभन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।

- उमाकान्त मालविय



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