Saturday, September 12, 2009

Aaj Kuchh Maangtee Hoon Priya - Manoshi Chatterjee

आज कुछ माँगती हूँ प्रिय

आज कुछ माँगती हूँ मैं
प्रिय क्या दे सकोगे तुम?
मौन का मौन में प्रत्युत्तर
अनछुये छुअन का अहसास
देर तक चुप्पी को बाँध कर
खेलो अपने आसपास
क्या ऐसी सीमा में खुद को
प्रिय बांध सकोगे तुम
आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...

तुम्हारे इक छोटे से दुख से
कभी जो मेरा मन भर आये
ढुलक पड़े आँखों से मोती
सीमा तोड़ कर बह जाये
तो ज़रा देर उँगली पर अपने
दे देना रुकने को जगह तुम
उसे थोड़ी देर का आश्रय
प्रिय क्या दे सकोगे तुम?
आज कुछ मांगती हूँ प्रिय...

कभी जब देर तक तुम्हारी
आंखों में मैं न रह पाऊँ
बोझिल से सपनों के भीड़
में धीरे से गुम हो जाऊँ
और किसी छोटे से स्वप्न
के पीछे जा कर छुप जाऊँ
ऐसे में बिन आहट के समय
को क्या लाँघ सकोगे तुम
आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...

- मानोशी चटर्जी


Prateekshaa Ke Pal - Mahima Bokariya

प्रतीक्षा के पल, फिर कहाँ किस ओर

जहाँ भी देखूँ तुम्हीं हो हर ओर
प्रतीक्षा के पल, फिर कहाँ किस ओर ॥

चेहरे पर अरुणाई सी खिल जाती
धड़कनें स्पन्दन बन मचल जाती
यादों की बारिश में, नाचे मन मोर ॥

कब तन्हा जब साथ तुम, बन परछाई
साथ देख तुम्हारा खुदा भी मांगे मेरी तन्हाई
मेरे हर क्षण को सजाया, तुमने चित्त चोर ॥

मेरे संग चांद भी करता रहता इंतज़ार
तेरी हर बात को उससे कहा मैंने कितनी बार
फिर भी सुनता मुस्कुराकर, जब तक न होती भोर ॥

तुम्हारे लिए हूँ मैं शायद, बहुत दूर
तुम पर पास मेरे, जितना आँखों के नूर
मेरी साँसों को बाँधे, तेरे स्नेह की डोर ॥

- माहिमा बोकाडिया


Ateet - Mahavir Sharma

अतीत


याद किसी की गीत बन गई !

कितना अलबेला सा लगता था, मुझे तुम्‍हारा हर सपना
साकार बनाने से पहले , क्यों फेरा प्रयेसी मुख अपना
तुम थी कितनी दूर और मैं, नगरी के उस पार खङा था
अरुण कपोलों पर काली सी, दो अलकों का जाल पङा था
अब तुम ही अनचाहे मन से अंतर का संगीत बन गई ।

याद किसी की गीत बन गई !

उस दिन हंसता चांद और तुम , झांक रही छत से मदमाती
आंख मिचौनी सी करती थीं, लट संभालती नयन घुमाती
कसे हुए अंगों में झीने, पट का बंधन भार हो उठा
और तुम्‍हारी पायल से, मुखरित मेरा संसार हो उठा
सचमुच वह चितवन तो मेरे, अंतर्तम का मीत बन गई ।

याद किसी की गीत बन गई !

तुम ने जो कुछ दिया आज वह मेरा पंथ प्रवाह बना है
आज थके नयनों में पिघला, आंसू मन की दाह बना है
अब न शलभ की पुलक प्रतीक्षा, और न जलने की अभिलाषा
सांसों के बोझिल बंधन में, बंधी अधूरी सी परिभाषा
लेकिन यह तारों की तङपन, धङकन की चिर प्रीत बन गई ।

याद किसी की गीत बन गई !

- महावीर शर्मा


Parmaanu Urjaa - Kavi Kulwant Singh

परमाणू ऊर्जा

अति सूक्ष्म परमाणु
असीमित उर्जा भंडार
साध इनकी शक्ति
सृजनात्मकता अपार!

कलुषित मन विचार
दे रूप इसे विकराल,
यह वो ब्रह्मास्त्र है -
जिससे धरा बने पाताल!

परमाणुओं का यह महादैत्य
कल्पित नहीं यथार्थ है,
यदि बोतल से निकला
सृष्टि का विनाश है!

हिरोशिमा तो अल्पांश था
परमाणु शक्ति विध्वंस का,
परमाणु अस्त्रागार है -
सौ सौ धरा के नाश का!

संभल मानव
अभी समय है,
विध्वंस तांडव से पूर्व
निद्रा अपनी पूर्ण कर ले!

इस अग्नि बीज लो
एकत्र करना बंद कर,
पूर्व इसमें भस्म हो
धरा मानव इतिहास बन ले!

- कवि कुलवंत सिंह


Visangatiyaan - Kanta Gogia

विसंगतियां

जब भी मुझे
जंजीरों का अहसास
कुछ ज्यादा हुआ है
कुछ कर गुज़रने की ललक
मुझमें बढ़ी है
सीमाएं तोड़ जाने की शक्ति
मेरे बंधे हाथों ने दी है
पैरों की बेड़ियों ने
गगनचुम्बी हौसले दिए हैं
सच कहूँ ठोकरों ने मेरी ज़िन्दगी
गतिशील ही की है
जब भी दोस्तों ने मेरे
अस्तित्व को नकारना चाहा
मुझे अपनी ही पहचान मिली है ।

- कान्ता गोगिया


Yun Chhed Kar Dhun - Kamlesh Pandey 'Shazar'

यूँ छेड़ कर धुन

यूँ छेड़ कर धुन कोई सुमधुर रुक गया
कि मैं विवश सा गुनगुनाता रहा
सारी रात
उस छूटे हुए टूटे हुए सुर को
सुनहरी पंक्तियों के वस्त्र पहनाता रहा
गाता रहा

यूँ छेड़ कर धुन कोई सुमधुर रुक गया
कि मैं मानस की दीवारों पर चित्र भर
ले कल्पना की तूलिका
और भाव के उजले बसंती रंग भरता रहा
जैसे स्वप्न से मिलने को आतुर

यूँ छेड़ कर धुन कोई सुमधुर रुक गया
मैं समय की मुक्तावली को रख परे
उन्माद नयनों में भरे
विस्तीर्ण नभ से धरा तक ढूँढा किया
ध्वनिश्रोत
खोया थिरकते पग का नुपुर

यूँ छेड़ कर धुन कोई सुमधुर

- कमलेश पाण्डे 'शज़र'


Kaash - Kamlesh Pandey 'Shazar'

काश़

ना समझ सका
मैं खुद जिसको
अधखुला राज़
अनकही बात
मैं काश़ तुम्हे समझा पाता

तेरी नज़रों के
दो सवाल
दो प्रश्नचिन्ह
जिनके जवाब
मैं काश़ कभी लौटा पाता

कच्चे धागे
इन सपनों के
उलझे उलझे
सुलगे सुलगे
मैं काश़ कभी सुलझा पाता

जुगनू बिखराती
चाँद रात
हाथों में हाथ
दो पल का साथ
मैं काश कभी दोहरा पाता

ख़्वाबों से महकी
सरज़मीं
वो दिलनशीं
कितनी हसीं
मैं काश तुम्हे दिखला पाता

वो गया मोड़
हम साथ छोड़
हैं अलग अलग
इक कड़वा सच
मैं काश इसे झुठला पाता

- कमलेश पाण्डे 'शज़र'


Tum - Jitendra Dave

तुम

एक ख़्वाब की नदी सी
मुझमें जो बहती हो

अलसाए दिन ढ़ोते हैं
उनींदी रातों को

मैं जानता नहीं ये क्या है
मैं सोचता नहीं ये क्यों है

हर बार तुम्हे मिटाता हूँ
हर बार तुम बन जाती हो

एक ख़्वाब की नदी सी ...

- जितेन्द्र दवे


Pyaar Gangaa Kee Dhaar - Harihar Jha

प्यार गंगा की धार


रजनी जग को सुलाये
सहे तिमिर का वार
नभ खुश हो पहनाये
चांद-तारों का हार

बन के खुद आइना रहा रूप को निखार
प्यार गंगा की धार

भूख सह कर भी मां
दर्द से जार-जार
तृप्त कर दे शिशु को
कैसी खुश हो अपार

भर के बांहों में वह करे असुंवन संचार
प्यार गंगा की धार

भक्त सहते गये
दुष्ट दैत्यों की मार
किया जगजननी ने
राक्षसों पर प्रहार

माँ की लीली कहे करुणा जीवन का सार
प्यार गंगा की धार

प्रकृति मां का रूप
झेले जगति का भार
लालची नर करे
दासी जैसा व्यवहार

छेद ना कर मूरख जबकि नैया मंझदार
प्यार गंगा की धार

क्रोध मद लोभ से
हुआ जीवन दुष्वार
काम से निकला प्रेम -
पुष्प के रस का तार

बांध कर ले गया स्वार्थ-लिप्सा के पार
प्यार गंगा की धार।

- हरिहर झा


Nritya - Divya Mathur

नृत्य


धूसर रेत के
टीले पर
चाँदनी
आई उतर

साठ कली का
घाघरा
अँगिया
एक कली भर

पीले, लाल
सुर्ख रंगों से
रंगी थी
उसकी चूनर

वाणी सुरीली
कमर लचीली
पाँव उठे जो इस गोरी के
कैसे झूमी रेत नचीली।

- दिव्या माथुर


Ek Baunee Boond - Divya Mathur,

एक बौनी बूँद


एक बौनी बूँद ने
मेहराब से लटक
अपना कद
लंबा करना चाहा

बाकी बूँदें भी
देखा देखी
लंबा होने की
होड़ में
धक्का मुक्की
लगा लटकीं

क्षण भर के लिए
लंबी हुई
फिर गिरीं
और आ मिलीं
अन्य बूँदों में
पानी पानी होती हुई
नादानी पर अपनी।

- दिव्या माथुर


Dhatt - Divya Mathur

धत्


सीधा
मेरी आँखों में
बेधड़क घूरती
बिल्ली सा
वह एक
निडर ख़्याल तेरा
टाँगों के बीच
पूँछ दबा
मेरी एक धत् से
भाग लिया।

- दिव्या माथुर


Dheere Dheere Shaam Chalee Aayee - Devi Nangrani

धीरे धीरे शाम चली आई


धीरे धीरे शाम चली आई
भीनी भीनी खुशबू छाई

इन्द्रधनुषी रँग मेरे मन का
मैं उसकी परछाई, छाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥

बूँद पडे बारिश की, सौंधी
महक मिट्टी की भाई, भाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥

भीगी मेरे तन की चादर
प्यास न पर बुझ पाई, पाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥

कल जो बीज थे मैने बोए
हरियाली अब छाई, छाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥

आँगन में कुछ फूल खिले हैं
रँगत मन को भाई, भाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥

सुर से सुर मिल राग बना यह
मालकौंस रस बरसाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥

सातरँगों की सरगम, कारी
कोयल ने है गाई, गाई
धीरे धीरे शाम चली आई॥

महकाए मन मेरा देवी
भोर न ऐसी आई, आई
धीरे धीरे शाम चली आई॥

- देवी नागरानी


Meraa Kachchaa Aangan - Deepmala Mahla

मेरा कच्चा आंगन

सौंप दी है तुम्हें
अपने सपनों की धरती
अपने सपनों का आकाश ...

अब बोओ तुम बीज
भरो तुम रंग।
इन्द्रधनुष के ... चांदनी के ... अमावस के ...
या फिर मेरे तुम्हारे।
फिर जियो तुम
और पियो तुम।

लौटा नहीं सकते तुम मुझे
मेरे हिस्से के ज़मीं अम्बर
क्योंकि अब मैं नहीं हूँ ...
मैं तो हो गयी हूँ तुम।

आती है ना तुम्हें
महक मेरे कच्चे आंगन की
अपने दिल से ...

- दीपमाला महला


Maa Kee Vyathaa - Deepa Josh

माँ की व्यथा

मेरी व्यथा
अनकही सही
अनजानी नहीं है
मुझ जैसी
हज़ारों नारियों की
कहानी यही है

जन्म से ही
खुद को
अबला जाना
जीवन के हर मोड़ पर
परिजनों ने ही
हेय माना

थी कितनी प्रफुल्लित मैं
उस अनूठे अहसास से
रच बस रहा था जब
एक नन्हा अस्तित्व
मेरी सांसों की तार में
प्रकृति के हर स्वर में
नया संगीत सुन रही थी
अपनी ही धुन में
न जाने कितने
स्वप्न बुन रही थी

लम्बी अमावस के बाद
पूर्णिमा का चाँद आया
एक नन्हीं सी कली ने
मेरे आंगन को सजाया

आए सभी मित्रगण, सम्बन्धी
कुछ के चहरे थे लटके
तो कुछ के नेत्रों में
आंसू थे अटके
भांति भांति से
सभी समझाते
कभी देते सांत्वना
तो कभी पीठ थपथपाते
कुछ ने तो दबे शब्दों में
यह भी कह डाला
घबराओ नहीं, खुलेगा कभी
तुम्हारी किस्मत का भी ताला

लुप्त हुआ गौरव
खो गया आनन्द
अनजानी पीड़ा से यह सोचकर
बोझिल हुआ मन
क्या हुआ अपराध
जो ये सब मुझे कोसते हैं
दबे शब्दों में
मन की कटुता में
मिश्री घोलते हैं

काश! ममता में होता साहस
माँ की व्यथा को शब्द मिल जाते
चीखकर मेरी नन्हीं कली का
सबसे परिचय यूँ कराते
न इसे हेय, न अबला जानो
'खिलने दो खुशबू पहचानो'

- दीपा जोशी


Kisse Maange Apnee Pehchaan - Deepa Joshi

किससे माँगें अपनी पहचान

हीय में उपजी,
पलकों में पली,
नक्षत्र सी आँखों के
अम्बर में सजी,
पल‍ ‍दो पल
पलक दोलों में झूल,
कपोलों में गई जो ढुलक,
मूक, परिचयहीन
वेदना नादान,
किससे माँगे अपनी पहचान।

नभ से बिछुड़ी,
धरा पर आ गिरी,
अनजान डगर पर
जो निकली,
पल दो पल
पुष्प दल पर सजी,
अनिल के चल पंखों के साथ
रज में जा मिली,
निस्तेज, प्राणहीन
ओस की बूँद नादान,
किससे माँगे अपनी पहचान।

सागर का प्रणय लास,
बेसुध वापिका
लगी करने नभ से बात,
पल दो पल
का वीचि विलास,
शमित शर ने
तोड़ा तभी प्रमाद,
मौन, अस्तित्वहीन
लहर नादान,
किससे माँगे अपनी पहचान

सृष्टि ! कहो कैसा यह विधान
देकर एक ही आदि अंत की साँस
तुच्छ किए जो नादान
किससे माँगे अपनी पहचान।

- दीपा जोशी


Aayee Holi Aayee - Deepa Joshi

आयी होली आयी

आयी होली आयी
बजने लगे
उमंग के साज
इन्द्रधनुषीय रंगों से
रंग दो
पिया आज

न भाए रंग
अबीर का
न सोहे
रंग गुलाल
नेह के रंगों से पिया
रंग दो
चुनरिया लाल

न जानूँ बात
सुरों की
है अनजानी
हर ताल
होली के मद में नाचूंगी
तुम संग
हो बेसुध बिन साज

बाट तुम्हारी
मैं जोहुंगी
नयन बिछाए
हर राह
भूल न जाना
बात मिलन की
आई होली आज

- दीपा जोशी


Dadaji - Ashok Gupta

दादाजी

दादाजी और उनकी सायकल के पीछे
बच्चे दौड़ते थे,
झोपड़ी और बंगलेवालों के।
दादाजी की काली बड़ी देह,
दिनों पुरानी खिचड़ी सी दाढ़ी
और सीट के पीछे लटकती हुई
लम्बी लहराती कमीज़।
चौड़ा सफेद पायजामा पहने
वे पेडल मारते चले जाते,
उसी रास्ते,
दिन प्रतिदिन।

बच्चे खुशी से चीखते, चिल्लाते,
"दादाजी! दादाजी!"
और दूर दूर तक
उनका पीछा करते,
जब तक वे थक नहीं जाते,
और एक पैर पर सायकल टिकाकर,
अपनी जेब से रंग बिरंगी पपरमिंट
निकालकर बच्चों को देते।

उन्होंने फिर चलना शुरू ही किया होता,
अतृप्त, वे चीखते, "दादाजी! दादाजी!"
उन्हें चिढ़ाते हुए,
जब तक वे उनके घर से
बहुत दूर तक निकल नहीं जाते।

यह सब भूल गए
और बच्चे अपनी अपनी राह चले गए।
एक दिन अचानक मुझे दादाजी मिल गए,
एक पुरानी ढहती हुई झोपड़ी के सामने
चारपाई पर बैठे हुए।
मैं संकोच करता सा रुका,
"दा दादाजी," मैं हिचकिचाया।
उनके सीधी तरफ लकवा मार गया था
और वे मुझे सुन नहीं पाए।
अपना मुंह उनके कान के करीब लाकर
मैं कुछ ऊंचे से बोला, "दादाजी"

वे धीरे से रुकते रुकते
एक करवट मुड़े,
और एक लाल पपरमिंट
जेब से निकालकर
मेरे हाथ पर रख दी।

- अशोक गुप्ता


Patjhar Aur Vasant - Arun Kumar

पतझड़ और वसंत

हाय कितना निष्ठुर था वो पतझड़,
जीवन युक्त होकर भी कितने
निर्जीव लगते थे वो वृक्ष,
न कोई संवाद, न वाद-विवाद,
बस खड़े खड़े सहते रहते थे,
शिशिर की नम रातों में
उग्र समीर का आर्तनाद |
हे शशि इस तम् के सागर
का कोई है क्या पार कहीं,
कैसे सहते हैं जीव सभी
इस शीत रिपु के सर्प दंश |
निरुत्तर शशि, मौन धरा
स्तंभित शतदल, क्षीण प्रभा
संकुचित होकर शशि,
घनदल के पीछे छिप चला,
मीलों दूर किसी श्रृगाल ने
सहमति में हुंकार भरा |

जीवन का है चहुँ ओर प्रकाश,
कण कण में हैं अशंख्य प्राण |
चारों ओर हो रहा मधुर गान,
नव छंद नव रंग ले आया नया विहान |
यह कौन नया आगंतुक है ?
जिसके स्वागत में सजी दिशाएं सारी ,
महक रही फूलों की खुशबू से क्यारी क्यारी |
पीकी तू ही बता दे,
किसका संदेशा पहुचाने तू फिरती है मारी मारी |
उन्ही पुराने वृक्षों ने भी नए नए पत्ते पाए
अनगिनत फूलों से रंजित, अनेकों मकरंदों से सुसज्जित
सारा चमन मधुमय है सारा आलम मंगलमय
चारों ओर कोलाहल है जीवन का प्रतिपल सृजन |
तभी कहीं से छोटी तितली पर फैलाती
थोड़ा शर्माती इठलाती फिर, दूर जरा उड़ जाती |
कभी इस फूल कभी उस कली
कभी पास पास कभी दूर चली
कभी हवा के झोंके से लड़ती
कभी फूल के पास पहुच के भी सहमी सहमी रुकी रहती,
आखिर एक फूल उसे पसंद आया, और वो उसपर बैठ गयी
वृछ हँसे फिर अपनी डालियों को हिला,
मानो एक दुसरे से कहा,
पतझड़ के गर्भ से जन्मा
जीवन का कितना सुन्दर ये क्रम !

- अरुण कुमार


Niyati - Arif Khan

नियति


रात की दस्तक दरवाज़े पर है
आज का दिन भी बीत गया है
कितना था उजाला फिर भी फिर से
अन्धियारा ही जीत गया है
एकान्त की चादर ओढ़ कर फिर से
मैं खुद में खोया जाता हूँ
आँखों के सामने यादों के रथ पर
मेरा ही अतीत गया है
सन्नाटों के गुन्जन में दबकर
अपनी ही आवाज़ नहीं आती मुझको
आँखों की सरहद पर लड़ता
आँसू भी अब जीत गया है
टूटे दर्पण के सामने बैठकर
मैं स्वयं को खोज रहा हूँ
यूँ ही बैठे बैठे जाने
कितना अरसा बीत गया है ... ॥

- आरिफ़ ख़ान


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