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Monday, September 7, 2009

Vijay - Sumitranandan Pant

विजय

'उत्तरा' से

मैं चिर श्रद्धा लेकर आई
वह साध बनी प्रिय परिचय में,
मैं भक्ति हृदय में भर लाई,
वह प्रीति बनी उर परिणय में।

      जिज्ञासा से था आकुल मन
      वह मिटी, हुई कब तन्मय मैं,
      विश्वास माँगती थी प्रतिक्षण
      आधार पा गई निश्चय मैं !

           प्राणों की तृष्णा हुई लीन
           स्वप्नों के गोपन संचय में
           संशय भय मोह विषाद हीन
           लज्जा करुणा में निर्भय मैं !

                 लज्जा जाने कब बनी मान,
                 अधिकार मिला कब अनुनय में
                 पूजन आराधन बने गान
                 कैसे, कब? करती विस्मय मैं !

उर करुणा के हित था कातर
सम्मान पा गई अक्षय मैं,
पापों अभिशापों की थी घर
वरदान बनी मंगलमय मैं !

           बाधा-विरोध अनुकूल बने
           अंतर्चेतन अरुणोदय में,
           पथ भूल विहँस मृदु फूल बने
           मैं विजयी प्रिय, तेरी जय में।

- सुमित्रानंदन पंत


Amar Sparsh - Sumitranandan Pant

अमर स्पर्श

'युगपथ' से

खिल उठा हृदय,
पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!

खुल गए साधना के बंधन,
संगीत बना, उर का रोदन,
अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,
सीमाएँ अमिट हुईं सब लय।

क्यों रहे न जीवन में सुख दुख
क्यों जन्म मृत्यु से चित्त विमुख?
तुम रहो दृगों के जो सम्मुख
प्रिय हो मुझको भ्रम भय संशय!

तन में आएँ शैशव यौवन
मन में हों विरह मिलन के व्रण,
युग स्थितियों से प्रेरित जीवन
उर रहे प्रीति में चिर तन्मय!

जो नित्य अनित्य जगत का क्रम
वह रहे, न कुछ बदले, हो कम,
हो प्रगति ह्रास का भी विभ्रम,
जग से परिचय, तुमसे परिणय!

तुम सुंदर से बन अति सुंदर
आओ अंतर में अंतरतर,
तुम विजयी जो, प्रिय हो मुझ पर
वरदान, पराजय हो निश्चय!

- सुमित्रानंदन पंत


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