यूँ ही ...
तुम समन्दर का किनारा हो
मैं एक प्यासी लहर की तरह
तुम्हे चूमने के लिए उठता हूँ
तुम तो चट्टान की तरह
वैसी ही खड़ी रहती हो
मैं ही हर बार तुम्हे
बस छू के लौट जाता हूँ
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यूँ ही ...
तुम समन्दर का किनारा हो
मैं एक प्यासी लहर की तरह
तुम्हे चूमने के लिए उठता हूँ
तुम तो चट्टान की तरह
वैसी ही खड़ी रहती हो
मैं ही हर बार तुम्हे
बस छू के लौट जाता हूँ
रिश्ते
रिश्तों को सीमाओं में नहीं बाँधा करते
उन्हें झूँठी परिभाषाओं में नहीं ढाला करते
उडनें दो इन्हें उन्मुक्त पँछियों की तरह
बहती हुई नदी की तरह
तलाश करनें दो इन्हें अपनी सीमाएं
खुद ही ढूँढ लेंगे उपमाएं
होनें दो वही जो क्षण कहे
सीमा वही हो जो मन कहे
प्रतीक्षा
मैं और तुम
वृत्त की परिधि के
अलग अलग कोनों में
बैठे दो बिन्दु हैं,
मैनें तो अपनें
हिस्से का अर्धव्यास
पूरा कर लिया ,
क्या तुम केन्द्र पर
मुझसे मिलनें के लिये आओगी ?
अस्तित्व
मैनें कई बार
कोशिश की है
तुम से दूर जानें की,
लेकिन
मीलों चलनें के बाद
जब मुड़ कर देखता हूँ
तो तुम्हें
उतना ही करीब पाता
हूँ |
तुम्हारे इर्द
गिर्द
वृत्त की
परिधि बन कर रह गया
हूँ मैं ।
अगले खम्भे तक का सफ़र
याद है,
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,
सड़्क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब
चलते चलते
थक जाता था
तुम कहती थीं ,
बस
उस अगले खम्भे
तक और ।
आज
मैं अकेला ही
उस सड़्क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब
निगाह से
देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता
पूछ रहे हैं
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है
सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद
अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा
इन्तजार कर रही हो !