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Monday, August 10, 2009

Yun Hee - Anoop Bhargava

यूँ ही ...

तुम समन्दर का किनारा हो
मैं एक प्यासी लहर की तरह
तुम्हे चूमने के लिए उठता हूँ
तुम तो चट्टान की तरह
वैसी ही खड़ी रहती हो
मैं ही हर बार तुम्हे
बस छू के लौट जाता हूँ

- अनूप भार्गव


Rishtey - Anoop Bhargava

रिश्ते


रिश्तों को सीमाओं में नहीं बाँधा करते
उन्हें झूँठी परिभाषाओं में नहीं ढाला करते

उडनें दो इन्हें उन्मुक्त पँछियों की तरह
बहती हुई नदी की तरह
तलाश करनें दो इन्हें अपनी सीमाएं
खुद ही ढूँढ लेंगे उपमाएं

होनें दो वही जो क्षण कहे
सीमा वही हो जो मन कहे  


- अनूप भार्गव


Prateekshaa - Anoop Bhargava

प्रतीक्षा


मैं और तुम 
वृत्त की परिधि के 
अलग अलग कोनों में 
बैठे दो बिन्दु हैं, 
मैनें तो अपनें 
हिस्से का अर्धव्यास 
पूरा कर लिया , 
क्या तुम केन्द्र पर 
मुझसे मिलनें के लिये आओगी ? 

- अनूप भार्गव


Astitva -Anoop Bhargava

अस्तित्व

मैनें कई बार 
कोशिश की है
तुम से दूर जानें की,
लेकिन 
मीलों चलनें के बाद
जब मुड़ कर देखता हूँ
तो तुम्हें 
उतना ही करीब पाता
हूँ |

तुम्हारे इर्द
गिर्द 
वृत्त की
परिधि बन कर रह गया
हूँ मैं ।

- अनूप भार्गव


Agle Khambe Tak Kaa Safar - Anoop Bhargava

अगले खम्भे तक का सफ़र


याद है, 
तुम और मैं 
पहाड़ी वाले शहर की 
लम्बी, घुमावदार,
सड़्क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह 
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब 
चलते चलते
थक जाता था
तुम कहती थीं ,
बस
उस अगले खम्भे 
तक और ।

आज 
मैं अकेला ही
उस सड़्क पर निकल आया हूँ , 
खम्भे मुझे अजीब 
निगाह से 
देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता 
पूछ रहे हैं
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ 
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के , 
अगले खम्भे तक पहुँचना है 
सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद 
अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा 
इन्तजार कर रही हो ! 

- अनूप भार्गव


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